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चैत्र मास में गुड़, वैशाख मास में तेल

यह एक पुरानी कहावत है, " चैते गुड़, बैसाखे तेल, जेठे पन्थ, असाढ़े बेल, सावन साग, भादों दही, क्वार करेला, कातिक मही, अगहन जीरा, पूसे धना, माघे मिश्री, फागुन चना। " इसका मतलब है कि   हर महीने के हिसाब से कुछ चीज़ों से बचना चाहिए और कुछ खानी चाहिए, ताकि बीमारियाँ न हों, जैसे चैत्र (मार्च-अप्रैल) में गुड़ नहीं, वैशाख (अप्रैल-मई) में नया तेल नहीं लगाना चाहिए (शरीर पर) , आदि, ताकि मौसम के अनुसार शरीर स्वस्थ रहे और डॉक्टर के पास न जाना पड़े।   पूरी कहावत और उसका अर्थ: चैत्र (मार्च-अप्रैल):  गुड़ नहीं खाना चाहिए (इसके बजाय चना खा सकते हैं)। वैशाख (अप्रैल-मई):  नया तेल नहीं लगाना चाहिए (तली-भुनी चीज़ों से बचें)। ज्येष्ठ (मई-जून):  दोपहर में ज़्यादा यात्रा न करें, आराम करें। आषाढ़ (जून-जुलाई):  बेल का सेवन करें। सावन (जुलाई-अगस्त):  साग (हरी पत्तेदार सब्ज़ियां) न खाएं। भादो (अगस्त-सितंबर):  दही न खाएं, कड़वे (तिक्त) रस लें (जैसे करेला)। क्वार (सितंबर-अक्टूबर):  करेला न खाएं, गुड़ खा सकते हैं। कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर):  दही (मही) न खाएं (इसके बजाय आ...